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गोरखपुर
• 14-09-2026
मुफ्त के भोजन ने बदला बंदरों का मिजाज
बदल रहा बंदरों का व्यवहार
गोरखपुर : बंदरों का आतंक बढ़ रहा है, जिससे रुस्तमपुर समेत कई इलाकों में लोग परेशान हैं और कई लोग घायल हुए हैं। नगर निगम को बंदर पकड़ने वाली एजेंसी नहीं मिल पा रही है, जबकि लोगों द्वारा उन्हें खाना खिलाना बंदरों के आबादी में आने का मुख्य कारण है।रुस्तमपुर के कजाकपुर क्षेत्र में बंदरों से लोग परेशान हैं। दो दिन में तीन लोगों को बंदर काट चुका है। नगर निगम परिसर में ही एक बंदर के दौड़ाए जाने से स्कूटर सवार युवक गिर गया और उसे काफी चोटें आईं। कुछ दिन पहले एमएमयूटी की एक छात्रा को बंदर ने काट लिया। यह तो बानगी है। आवारा कुत्तों की ही तरह अब बंदर भी रोज शहर के किसी न किसी हिस्से में लोगों को काट ले रहे। शहर में बंदरों के बढ़ते आतंक के बीच समस्या केवल बंदरों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं है। सड़क किनारे और शहर के विभिन्न हिस्सों में लोगों द्वारा बंदरों को खाना खिलाने की आदत भी उन्हें आबादी की ओर खींचने का काम कर रही है। जंगल के आसपास या रास्तों में आसानी से भोजन मिलने के कारण बंदरों का इंसानी बस्तियों में आना बढ़ रहा है। नतीजा यह है कि अब घरों, बाजारों और प्रमुख सड़कों पर बंदरों के झुंड दिखाई दे रहे हैं। बावजूद नगर निगम की बंदर पकड़ने की व्यवस्था जमीन पर प्रभावी नहीं हो पा रही है। नए शासनादेश के जरिये शासन स्पष्ट कर चुका है कि शहरी क्षेत्रों में बंदरों को पकड़ने, उनका परिवहन करने और सुरक्षित स्थान पर छोड़ने की जिम्मेदारी नगर निगम की है। यह जिम्मेदारी पहले से ही नगर निगम को दी जा चुकी है। इसके तहत निगम प्रशासन ने बंदर पकड़ने के लिए दो बार निविदा प्रक्रिया अपनाई, लेकिन किसी भी फर्म या एजेंसी ने काम लेने में रुचि नहीं दिखाई। नगर निगम के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब शासन ने प्रति बंदर पकड़ने, परिवहन और सुरक्षित स्थान पर छोड़ने के लिए करीब 925 रुपये की दर तय कर रखी है, तब भी एजेंसी क्यों नहीं मिल रही। अधिकारियों के अनुसार बंदरों को पकड़ने के लिए प्रशिक्षित टीम, विशेष तकनीक और सुरक्षा इंतजाम की जरूरत होती है। बंदरों के हमलावर होने की स्थिति में कर्मचारियों और आसपास के लोगों की सुरक्षा भी चुनौती है। यही वजह निजी एजेंसियों की अरुचि का कारण मानी जा रही है।
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