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• gorakhpur, cm yogi, children, RTE • गोरखपुर / चरगांवा • 23-05-2026

RTE से 25% बच्चों का एडमिशन, 13 साल से बच्चों की फीस नहीं बढ़ाई सरकार ने, 75% बच्चों पर असर

रूरल न्यूज नेटवर्क।  शिक्षा का अधिकार (RTE) के तहत हर निजी स्कूल के नर्सरी और कक्षा 1 में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों का एडमिशन होता है। इन बच्चों के अभिभावकों को कोई पैसा नहीं देना होता है, इनकी फीस सरकार देती है। लेकिन पिछले 13 सालों से उत्तर प्रदेश में यह फीस रिवाइज नहीं हो सकी है, जिससे स्कूल ऐसे बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी उन अभिभावकों पर डालते हैं, जिनके बच्चे सामान्य तौर पर निजी स्कूलों में प्रवेश लेकर पढ़ाई कर रहे हैं।

स्कूल प्रबंधनों का कहना है कि इस बीच खर्चें काफी बढ़ गए। जो पैसा सरकार से मिलता है वह नाकाफी है, ऐसे में जो शेष 75 प्रतिशत बच्चे होते हैं, कहीं न कहीं उनपर बोझ पड़ता है। हर साल बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से RTE के तहत प्रवेश के लिए आवेदन आमंत्रित किए जाते हैं। बड़ी संख्या में लोग अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए आवेदन करते हैं।

बच्चा जिस वार्ड का निवासी होगा, उसी वार्ड के स्कूल में प्रवेश के लिए आवेदन कर सकता है। आवेदन आने के बाद प्रपत्रों की जांच की जाती है। उसके बाद लॉटरी के माध्यम से स्कूल आवंटित किए जाते हैं। हर साल लगभग 5000 बच्चों को स्कूल आवंटित किए जा रहे हैं।

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अब समझिए क्यों आवाज उठा रहे स्कूल प्रबंधक

RTE के तहत प्रविधान है कि गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में फ्री शिक्षा दी जाएगी। इसके लिए सभी स्कूलों (माइनारिटी में नहीं लागू) में 25 प्रतिशत सीट पर गरीब बच्चों का प्रवेश लेना होता है। इसके बदले सरकार प्रति बच्चा शुल्क स्कूल प्रबंधन को देती है।

यह शुल्क उतना ही होता है, जितना सरकार अपने सरकारी स्कूलों में एक बच्चे पर खर्च करती है। स्कूल संचालकों की मानें तो 2013 मे जो फीस निर्धारित की गई थी, वही अब भी है। यानी 13 सालों में फीस नहीं बढ़ी।

स्कूल संचालकों का कहना है कि RTE के तहत प्रति बच्चा 450 रुपए दिए जाते हैं, इसमें काफी परेशानी होती है। स्कूल में इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर तमाम खर्चे बढ़े हैं। ऐसे में फीस बढ़ानी पड़ती है। स्कूलों में 25 प्रतिशत ऐसे ही बच्चे हैं, जो सीधे फीस नहीं देते।

ऐसे में उनके हिस्से का भार भी उन बच्चों के अभिभावकों के कंधों पर पड़ता है, जिन्होंने सामान्य तरीके से एडमिशन कराया है और पूरी फीस देते हैं। सरकार की ओर से मिलने वाली फीस भी साल में 11 महीने ही दी जाती है। यह जरूरी नहीं कि हर महीने प्रतिपूर्ति मिल ही जाए।

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जानिए क्या कहते हैं स्कूल संचालक

स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय शाही बताते हैं कि 2013 से RTE के तहत प्रवेश लेने वाले बच्चों की फीस नहीं बढ़ी है। इससे स्कूल संचालकों को काफी परेशानी होती है। 13 साल बीतने के बाद अब कक्षा 8 तक हर कक्षा में 25 प्रतिशत बच्चे इसी श्रेणी के हैं।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि फर्जी प्रमाण पत्रों के जरिए ऐसे लोग इस योजना का लाभ पा जाते हैं, जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। इसके जरिए वे उन स्कूलों में प्रवेश पा जाते हैं, जहां मेरिट के चलते सामान्य तौर पर प्रवेश पाना मुश्किल होता है।

यह देखकर खराब लगता है कि RTE के तहत प्रवेश लेने वाले बच्चों के अभिभावक कार से स्कूल छोड़ने आते हैं। इस दिशा में विभाग को और कड़ाई करनी होगी। उन्होंने बताया कि कई बार सरकार में यह मांग रखी गई है कि RTE के तहत फीस बढ़ाई जाए लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। सभी स्कूल संचालक इससे काफी परेशान हैं। स्कूल के प्रबंधक मनीष मिश्र कहते हैं कि RTE के तहत प्रवेश पाने वाले बच्चों के फीस के मामले में केवल बिहार ही उत्तर प्रदेश से पीछे है। बाकी राज्यों में फीस अधिक हो चुकी है। ऐसा कैसे हो सकता है कि 13 साल में सरकार का खर्च बढ़ा ही न हो। इस खर्च को कभी सार्वजनिक नहीं किया जाता।  यदि केवल इंफ्लेशन ही जोड़ें तो अब तक 1500 रुपए से अधिक हो गया होगा। सरकार की ओर से फीस न बढ़ाने से मजबूरी में शेष 75 प्रतिशत बच्चों के कंधों पर अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ता है। सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए।

नॉन स्कूलिंग से भी बढ़ी परेशानी

स्कूल संचालकों का कहना है कि नॉन स्कूलिंग के चलते नौवीं कक्षा के बाद बच्चों की संख्या स्कूलों में कम हो रही है। ऐसे में सारा बोझ कक्षा 8 तक के बच्चों पर ही दिखता है। कोचिंग के साथ नॉन स्कूलिंग में चले जाने से सामान्य स्कूलों में बच्चे नहीं मिलते।

अब जानिए क्या कहते हैं अभिभावक

अभिभावक डीबी मिश्र बताते हैं कि मेरिट के आधार पर उन्होंने अपने दो बच्चों का प्रवेश शहर के शीर्ष स्कूलों में से एक में कराया था। हर साल फीस बढ़ती है। जब 25 प्रतिशत बच्चों की ओर से फीस न के बराबर मिलेगी तो उसका बोझ तो हमपर ही पड़ना है। बच्चों को पढ़ाने में कमर टूट जाती है। सरकार को इसपर ध्यान देना चाहिए। एचएन दुबे कहते हैं कि गरीब बच्चों को पढ़ाना अच्च्छा काम है। लेकिन इसके लिए जो व्यवस्था बनी है, उसका पालन भी करना चाहिए। सरकार समय के अनुसार उन बच्चों के शुल्क की पर्याप्त प्रतिपूर्ति दे, जिससे उनके हिस्से का बोझ हम अभभावकों पर न पड़े। साथ ही ऐसे लोगों पर भी लगाम लगानी होगी, जो फर्जीवाड़ा कर गलत तरीके से इस योजना का लाभ उठाते हैं।

जानिए गोरखपुर में निजी स्कूलों की स्थिति

CBSE - 157 CISCE - 21 इनमें लगभग एक दर्जन स्कूल माइनॉरिटी के हैं। वहां RTE लागू नहीं होता।

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