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gorakhpur, cm yogi, AIIMS, Bombay blood group 11-Mar-2026 05:49 PM

एम्स में पहली बार मिला बॉम्बे ब्लड समूह का मरीज:40 वर्षीय महिला में हुई पहचान

रूरल न्यूज नेटवर्क एम्स गोरखपुर में इलाज के लिए भर्ती 40 वर्षीय महिला में अत्यंत दुर्लभ ‘बाम्बे ब्लड ग्रुप’ पाया गया है। यह रक्त समूह अत्यंत दुर्लभ माना जाता है, जो लगभग 10,000 व्यक्तियों में से किसी एक में पाया जाता है। एम्स गोरखपुर में इस तरह का मामला पहली बार सामने आया है, जिसे चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

गोरखपुर एम्स के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के प्रभारी डॉ. सौरभ मूर्ति ने बताया कि भारतीय जनसंख्या में बाम्बे रक्त समूह वाले मामले बहुत कम मिलते हैं। इसका मिलना चिकित्सकीय रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस रक्त समूह वाले व्यक्तियों में एच एंटीजन अनुपस्थित होता है। इसी कारण ऐसे मरीज केवल बाम्बे फीनोटाइप वाले दाताओं से ही सुरक्षित रूप से रक्त प्राप्त कर सकते हैं।

विशेषज्ञों की टीम ने की जांच

मरीज के रक्त समूह की पुष्टि विभाग की इम्यूनोहेमेटोलॉजी प्रयोगशाला में की गई। जांच में सीनियर रेजिडेंट डॉ. मोनिषा, डॉ. निरंजन और जूनियर रेजिडेंट डॉ. पार्शा शामिल रहे।

इस इम्यूनोहेमेटोलॉजिकल जांच में सीनियर रेजिडेंट डॉ. मोनिषा, डॉ. निरंजन और जूनियर रेजिडेंट डॉ. पार्शा शामिल थे।

एम्स में उपलब्ध हैं उन्नत जांच सुविधाएं

डॉ. सौरभ मूर्ति ने आगे बताया कि एम्स गोरखपुर के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की इम्यूनोहेमेटोलॉजी लैब में दुर्लभ एंटीसीरा और उन्नत परीक्षणों के लिए आवश्यक अभिकर्मक उपलब्ध हैं। इनकी मदद से एंटीबॉडी स्क्रीनिंग, एंटीबॉडी आइडेंटिफिकेशन, एल्यूशन और एडसॉर्प्शन जैसे जटिल परीक्षण नियमित रूप से किए जाते हैं। विभाग पहले भी कई मरीजों में एंटी-एम, एंटी-डी और एंटी-सी जैसी एंटीबॉडी की पहचान कर चुका है।

1952 में मुंबई में हुई थी खोज, ‘बाम्बे ब्लड ग्रुप’ नाम

बाम्बे रक्त समूह का नामकरण इसके खोज स्थल पर आधारित है। इस दुर्लभ रक्त समूह की खोज 1952 में मुंबई (तत्कालीन बाम्बे) में डॉ. वाई. एम. भेंडे ने की थी। यह सबसे पहले बाम्बे के कुछ व्यक्तियों में ही पाया गया था।

इसलिए इसे बाम्बे ब्लड ग्रुप कहा गया। इसे एचएच या ओएच फेनोटाइप भी कहा जाता है, और यह मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। यह सामान्य ओ ब्लड ग्रुप से अलग होता है क्योंकि इसमें एच एंटीजन अनुपस्थित रहता है। इसकी दुर्लभता के कारण इस समूह के मरीजों को केवल इसी समूह का रक्त चढ़ाया जा सकता है।

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गोरखपुर एम्स की कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने कहा, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग का यह कार्य प्रशंसनीय है। एम्स गोरखपुर पूर्वांचल की जनता को अत्याधुनिक निदान और रक्त आधान सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह उपलब्धि हमारे उत्कृष्टता, सुरक्षा और रोगी-केंद्रित देखभाल के संकल्प को दर्शाती है।

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