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Wednesday, 1st April, 2026
चरगांवा
रूरल न्यूज नेटवर्क। बचपन के ख्वाब और कैरियर बनाने में ही आज मनुष्य अपना पूरा जीवन समर्पित कर देता है। भागमभाग भरी इस दुनिया में उसके शौक धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं।
कुछ विरले ही होते हैं जो अपने बचपन के शौक को कैरियर से अलग रखते हुए भी जीवंत रखते हैं। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है दस नंबर बोरिंग के निवासी रवि द्विवेदी ने। इनके पिता दिनेश द्विवेदी रेल विभाग में कार्यरत थे। रवि को बचपन में माता-पिता द्वारा जो रूपए दिए जाते थे, उनसे रवि पौधे खरीद छत पर लगा दिया करते थे।
धीरे-धीरे स्थिति यह हो गई कि पूरी छत विभिन्न पौधों से भर गई। आसपास के स्थानीय लोग जब इन्हें देखते तो अक्सर पूछा करते थे कि यह पौधों की क्या उपयोगिता है, इस पर रवि अनभिज्ञता जाहिर कर देते थे। एक दिन इन्होंने इस पर काफी गंभीरता से सोचा तो धीरे-धीरे पौधों की खासियत व उपयोगिता समझ आने लगी। बस यहीं से इनका यह शौक कब जुनून में बदल गया, इन्हें पता ही नहीं चला।
जुबिली इंटर कालेज व गोरखपुर विश्वविद्यालय से आनर्स की उपाधि लेकर इन्हें वर्ष 1983 में पूर्वांचल ग्रामीण बैंक में बतौर फील्ड आफिसर की नौकरी मिली। नौकरी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए भी अपने प्रकृति प्रेम को कम नहीं होने दिया।
खाली समय में यह पौधों पर रिसर्च भी करने लगे। वैवाहिक दांपत्य में बंधने के बाद भी पौधों के लगाव दिनोंदिन इसलिए भी आगे बढ़ते गए कि इनकी पत्नी का इन्हें पूरा सहयोग मिलने लगा। मजे की बात तो यह है कि इनके घर दो जुड़वा बच्चियों ने जन्म लिया। दोनों बच्चियों को उच्च शिक्षा अर्जित कराकर उनकी शादियां कर अपने पारिवारिक दायित्वों का भी रवि द्विवेदी ने बखूबी निर्वहन किया। इसके बाद पौधों के प्रेम के साथ ही मधुबनी पेंटिंग में पारंगत होने का रवि ने संकल्प लिया।
इनके बनाई पेंटिंग
को मुख्यमंत्री योगी
आदित्यनाथ, राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु,
आनंदीबेन तक ने
खूब सराहा। रूरल
न्यूज नेटवर्क संवाददाता
से हुई बातचीत
में रवि द्विवेदी
बताते हैं कि बचपन के
प्रकृति प्रेम में
परिवार के सदस्यों
की भी अहम भूमिका रही
है। विदित हो
कि पीपल, पाकड
व बरगद की हरिशंकरी आज अपने
43 वर्ष पूरे कर चुकी है।
यही नहीं 43 वर्ष
पुराना बरगद, 38 वर्ष
पुराना पाकड, 25 वर्ष
पुराना गूलर, 25 वर्ष
पुराना रूद्राक्ष का
पौधा आज भी इनके आंगन
की शोभा बढ़ा
रहा है।
यह खासियतें भी जानें
रवि द्विवेदी के आंगन को अब विस्तार रूप देने वाले शख्स की तलाश है। वर्तमान में पीपल, बरगद, पाकड, गूलर, रूद्राक्ष, पनियाला, करौंदा, पपीता, आंवला, अखरोट, साखू, चिनार, अनार, चीकू, सेव, तेजपत्ता, कचनार, इलायची, केला, खिरनी, अमरख आदि पौधों का विशाल संग्रह इनके आंगन में ही बोनसाई के रूप में है। यही नहीं शहतूत की चार वैरायटी जिसमें लंबा व गोल शहतूत भी शामिल है। दो वैरायटी का शरीफा, दो वैरायटी के बेल, पान की विभिन्न वैरायटियां यहां उपलब्ध हैं।
काफी का पेड़ भी रवि
की बगिया में
अपनी खुबसूरती बिखेर
रहा है। बता दें कि
12 से 17 फिट तक
का काफी पेड़
यहां अपनी विशेष
पहचान स्थापित कर
चुका है। तीन पत्ते वाला
पारस पीपल यहां
की खूबसूरती में
और भी चार चांद लगाता
नजर आता है।
38 वर्ष पुराना पाकड
का पेड़ बोनसाई
के माध्यम से
यहां स्थापित है।
फूलों से भी
प्रेम
फलदार पौधे, औषधीय
पौधे से लेकर सब्जी तक
रवि ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।
इसके अलावा इनकी
बगिया में गेंदा,
गुलदाउदी, गुलमोहर आदि फूलों
की छठां देखते
ही बनती है।
साखू की गजब
कहानी
रवि द्विवेदी बताते हैं
कि साखू के पेड़ तो
मैंने लगा दिए।
वह बड़े होने
लगे तो आसपास
कबूतर, गौरैया ने
अपना घोंसला बना
लिया। यह देखकर
काफी खुशी होती
थी। लेकिन यह
खुशी तब मातम में बदल
गई जब यहां बिल्ली इनके
बच्चों को अपना शिकार बनाने
लगी। इस कारण मैंने साखू
को हटा दिया।
अब फिर नए सिरे से
तैयार किया जा रहा है।